साहित्यकार परिचय
श्रीमती कल्पना कुर्रे
माता /पिता – श्रीमती गीता घृतलहरे, श्री हेमचंद घृतलहरे
पति – श्री शिवदयाल कुर्रे
संतत–् पुत्र – 1. अभिनव 2. रिषभ
जन्मतिथि – 19 जून 1988
शिक्षा-
प्रकाशन-
पेशा – गृहणी
पता – ग्राम – कातलबोड़़
पोस्ट – देवरबीजा,
तहसील – साजा,
जिला – बेमेतरा (छ.ग.)
संपर्क- मो. – 8966810173
( यथार्थवादी कहानी)
” कर्म ”
हेमंत और रेखा अभी बहुत छोटे थे कि उसकी मां दोनों बच्चों को छोड़कर चली गई हेमंत दो साल का था और रेखा आठ महीने की थी हेमंत के पिता ने दूसरी शादी कर ली थी इसी दुख के कारण उसकी मां घर और दोनों बच्चों को छोड़कर चली गई थी हेमंत की मां से पहले उसके पिता की एक और पत्नी थी ‘ मंगला जिसकी कोई संतान नहीं थी हेमंत और रेखा की मां के घर छोड़कर जाने के बाद मंगला ही दोनों बच्चों को संभालती थी।
हेमंत की नई मां कमला का व्यवहार दोनों बच्चों के प्रति बिल्कुल भी अच्छा नहीं था उसे दोनों बच्चों से कोई प्रेम-भाव कोई लगाव नहीं था वह दोनों को फुटे आंख भी नहीं देखना चाहती थी जब कमला के खुद के बच्चे हो गए तो उसका व्यवहार और भी बदल गया कमला के पहले पति से दो बेटियां थी यहां आने के बाद दो और बेटियां हुई। हेमंत पांच साल का हो गया और रेखा तीन साल की थी।
कमला रसोई का काम देखती थी और मंगला खेती के साथ-साथ अपने निगरानी में नौकर- चाकर से काम करवाती थी इसलिए वह रसोई में ध्यान नहीं देती थी इधर कमला दिन ब दिन हेमंत और रेखा के लिए क्रूर होती जा रही थी क्योंकि वह दोनों उसके सगे बच्चे नहीं थे और यह भी कारण था कि हेमंत इकलौता वारिस था अपने पिता के जायदाद का,और कमला को बेटा नहीं हुआ दो बेटियों के बाद वह फिर से मां नहीं बनीं इसलिए वह अपना सारा गुस्सा दोनों बच्चों पर निकलती थी वह बहुत ही खुदगर्ज और कपटी औरत थी वह हेमंत और रेखा को ज्यादातर भुखा रखती थी खाना बनाते ही अपने बच्चों को खिला दिया करती थी और हेमंत और रेखा को खाना नहीं देती थी अपने बच्चों को खाना खिलाने के बाद भी दोनों बच्चों को खाना नहीं देती थी घर के सभी सदस्य अपने कामों में व्यस्त रहते थे ।
सभी सोचते थे कि उन बच्चों के साथ हेमंत और रेखा को भी खाना दे चुकी होगी। बच्चे घण्टों खाने का इंतजार करते थे रसोई के दरवाजे के पास तब जाकर उन्हें खाना मिलता था वह भी उसके पिता के आने के बाद उसके पिता जमींदारी संभालते थे उनके आते आते रात हो जाती बच्चे वही दरवाजे के पास सो जाते थे । किसी दिन कमला थाली खाली नहीं है बोल कर बहाने बनाती कि इंतजार करो तब खाना मिलेगा धीरे-धीरे सभी को समझ आने लगा कि कमला हेमंत और रेखा के साथ क्या कर रही है दोनों खाने का इंतजार कर थक के वही सो जाते हैं ।
इसलिए उसके पिता ने दोनों को अपने साथ ही खाना खिलाना शुरू कर दिया हेमंत और रेखा के पिता ने कमला से कुछ नहीं कहा किसी दिन डांट देते थे तो कमला बहाने बना कर बच जाती थी इस सब की जानकारी मंगला को हुई तो मंगला ने दोनों बच्चों पर पुरा ध्यान दिया मंगला संतानहीन औरत होते हुए भी ममता की मूरत थी उसके हृदय में अपार प्यार और ममता भरा था जो सौतेला होते हुए भी दोनों बच्चों पर सावन की तरह बरसता था मंगला की कोई औलाद नहीं थी तो कमला उसे बांझ बोल कर ताने दिया करती थी फिर भी मंगला बुरा नहीं मानती थी क्योंकि वह हेमंत और रेखा को अपनी सगी औलाद समझने लगी थी । वक्त के साथ दोनों बड़े होते गए दोनों बच्चे अपने दोनों मां ओ को बहुत प्यार करते थे अपने बड़े बुजुर्गो की सेवा करते थे हेमंत, कमला के क्रूर व्यवहार के बावजूद उसका बहुत सम्मान करता था उसकी देखभाल भी किया करता था।
जब सभी बच्चे बड़े हो गए रेखा और बाकी बहने शादी होकर चली गई हेमंत पढ़ाई पुरी करके अपने पिता के कामों में हाथ बंटाने लगा कुछ सालों में हेमंत की भी शादी हो गई उसकी पत्नी गीतांजली बहुत ही गुणवती सच्छी और अच्ची स्वभाव की थी दोनों ने मिलकर सब का ख्याल रखा सबकी सेवा की। कमला, हेमंत की पत्नी को नौकरानी की तरह समझती थी फिर भी गीतांजली उसे मां ही मानती थी क्योंकि वह हेमंत के लिए उसकी सगी मां जैसी थी। कमला ने जिंदगी भर हेमंत से नफ़रत की उसकी बेटियों ने भी हेमंत को कभी अपना भाई नहीं माना बचपन से ही हेमंत को मारने की कोशिश करती रहती थी एक बार हेमंत बाहर सोया था तभी कमला की एक बेटी ने उसके छाती पर पत्थर से मार दिया हेमंत सांस नहीं ले पा रहा था डाॅक्टर को दिखाना पड़ा था फिर भी हेमंत अपनी सौतेली बहनो से बहुत प्यार करता था ।
कमला सब देखतीं पर मानती नहीं थी कि हेमंत उसे अपना मानता है कमला ने अपने मन में बिठा लिया था कि वह तो सौतेला है सारा धन अकेला खायेगा लेकिन हेमंत का प्रेम -भाव देखकर कमला का हृदय परिवर्तन होने लगा था कि तभी उसकी बेटियां उसके कान भर देती उसकी बेटियां धन की लोभी थी उनके नजरों में रिश्तों से ज्यादा पैसो की एहमियत थी कमला की चारों बेटियां अपने ससुराल से ज्यादा अपने मायके में रहती थी और कुछ ना कुछ चुरा लिया करती थी हेमंत और गीतांजली को नौकर समझतीं थी फिर भी दोनों चुप थे चारों बहनों ने अपना हिस्सा तक ले लिया फिर भी वह सभी अपनी हरकतों से बाज नहीं आती थी हेमंत और गीतांजली को सब की खबर रहती पर कमला मां को बुरा ना लगे यह सोच कर दोनों चुप रहते थे। फिर कमला बिमार रहने लगी हेमंत और गीतांजली ने उसकी खुब सेवा की कमला का हृदय पिघल गया वह सोच- सोच कर रोती थी कि जिंदगी भर जिस बेटे से उसने नफ़रत की वह उससे कितना प्यार करता है उसकी इतनी सेवा करता है।
कमला का आखिरी समय आ गया वह पश्चाताप की आग में जल रही थी वह उस बच्चे को गले लगाना चाहती थी जिस बच्चे को मां के प्यार से वंचित रखा उस बच्चे को कभी मां का प्यार तो दूर की बात थी जब उसे मां की जरूरत थी उनसे प्यार के मिठे बोल तक नहीं बोले मां के लिए तरसते बच्चों को भुखा रखा इसी ग्लानि में कमला का दम घुटने लगा।
कमला बढ़ते हुए सांसों से हेमंत को आवाज देने लगी, “बेटा हेमंत, हेमंत बेटा ,बेटा ,हेमंत जल्दी से कमला के पास आया कमला आंखों में आंसू लिए हेमंत के हाथों को अपने हाथों में लेने के लिए अपना हाथ बढ़ाया हेमंत ने मां के हाथ थाम लिए कमला तभी घुटते हुए सांसों के साथ हेमंत से अपने आखिरी शब्द बोली मुझे माफ़ कर देना बेटा मैंने जिंदगी भर तुमसे नफ़रत की मुझे अपने कर्मों पर पछतावा है तुम मुझे एक बार माफ़ कर दो ताकि मैं सुकुन से मर सकु कमला ने हेमंत के हाथों को अपने छाती से लगा कर आखरी शब्द कहां, ” बेटा ” तो हेमंत की आंखों से आंसू की जलधारा बहने लगी फिर एक लम्बी सांस के बाद कमला की सांसें बंद हो गई उसने अपना दम तोड़ दिया।
इंसान अपने अच्छे कर्मो और सेवा-भाव से किसी का भी हृदय परिवर्तन कर सकता है आज हेमंत ने यह साबित कर दिया।