साहित्यकार परिचय
श्रीमती कल्पना कुर्रे
माता /पिता – श्रीमती गीता घृतलहरे, श्री हेमचंद घृतलहरे
पति – श्री शिवदयाल कुर्रे
संतति पुत्र – 1. अभिनव 2. रिषभ
जन्मतिथि – 19 जून 1988
शिक्षा- बी.ए. प्रथम उत्तीर्ण
प्रकाशन- 1. विश्वात्मा (साझा संकलन) 2. एक पैगाम तेरे नाम (साझा संकलन) 3. इन्द्रधनुष (साझा संकलन)
पुरस्कार⁄सम्मान–1. कलमकार साहित्य समता सम्मान-2024, 2. कलमवीर साहित्य सम्मान-2024, 3. इन्द्रधनुष साहित्य सम्मान-2024
पेशा – गृहणी
स्थायी पता – ग्राम – कातलबोड़़
पोस्ट – देवरबीजा,
तहसील – साजा,
जिला – बेमेतरा (छ.ग.)
संपर्क- मो. – 8966810173
”सौभाग्य लक्ष्मी”
गीतांजलि को घर में सब प्यार से गीतू बुलाते थे वह अभी 10 वर्ष की ही थी उतने ही छोटे उम्र में उसे अपने घर की सारी जिम्मेदारी दे दी गई थी उसके पिता की सरकारी नौकरी थी दो गांव में खेती-बाड़ी थी इसलिए गीतू की मां उसके भरोसे घर की सारी जिम्मेदारी सौंप कर खेती का काम देखने चली जाया करती थी गीतू से बड़े तीन भाई दो छोटे भाई और एक बहन थी गीतू के पिता ऑफिस चले जाते थे गीतू सुबह उठकर घर का सारा काम अकेली करती थी सभी के लिए खाना बनाकर स्कूल जाती थी उस बेचारी को तो कंघी तक करने का समय नहीं मिलता था कई दिन तो वह बिना खाना खाए ही स्कूल चल दिया करती थी एक दिन की बात थी गीतू को स्कूल जाने के लिए देर हो रही थी उसने घर का सारा काम निपटा लिया पर उसके पास खाना खाने का समय नहीं बचा वह बिना खाए ही स्कूल चली गई वहां पर प्रार्थना लाइन में खड़ी हो गई पर वहां तो बहुत तेज धूप थी वह उसे चक्कर आने लगा और वह बेहोश हो गयी ऐसे ही कई बार हुआ उसकी छोटी बहन अभी बहुत छोटी है सोचकर गीतू कभी भी उससे काम नहीं करवाती थी ।
गीतू अभी छोटी थी फिर भी सारा काम अकेली करती थी इसके बावजूद उसके घर में उससे ज्यादा उसकी छोटी बहन को सब प्यार करते थे एक दिन उसके घर में एक मेहमान आये वह आदमी गीतू के काम से बहुत प्रभावित हुआ उसने गीतू को देखते ही सोच लिया कि यह तो अन्नपूर्णा है सौभाग्य लक्ष्मी जिस घर जायेगी सौभाग्य ही सौभाग्य होगा इसका एक ही बेटा था और वे बहुत ही अमीर थे उसने घर जाते- जाते भगवान से मांग लिया की गीतू ही उसके घर की बहू बनेगी यह तो सच में सौभाग्य लक्ष्मी है 10 साल की उम्र में ही गीतू की शादी कर दी गई पर विदाई के लिए कुछ सालों का समय मांगा गया कि जब तक गीतू बड़ी नहीं हो जाती तब तक वह पढ़ाई करेंगी उसके बाद ही उसकी विदाई कर दी जाएगी गीतू का पति भी पढ़ाई कर रहा था बीतते समय के साथ गीतू बड़ी।
हो गई उसने दसवीं की पढ़ाई पुरी कर ली और जब वह बड़ी हो गई उसके माता-पिता ने उसकी विदाई करवा दी गीतू का पति अभी मैट्रिक से निकाला था विदाई के बाद गीतू ससुराल चली गई उसका पति कुछ महीने बाद कॉलेज के लिए गीतू के मायके में ही रहकर पढ़ाई करने लगा वह छुट्टियों में ही घर जाया करता था गीतू अपने ससुराल में ही रहती थी ससुराल में भी पूरी जिम्मेदारी गीतू की ही थी उसके ससुराल में दो सास, ससुर परदादा परदादी और 6 ननंदे थी वह भी एक नम्बर की काम चोर घर का कुछ भी काम नहीं करती थी कुछ कामों के लिए नौकर थे पर परिवार बहुत बड़ा था वह काम से थक जाती थी देखने में बड़े घर की बेटी और बहू कम नौकरानी जैसी हालत हो गई थी फिर गीतू मां बन गई साल बढ़ता गया और उसका परिवार भी गीतू एक धार्मिक संस्कारी स्त्री थी पूजा पाठ उपवास, भगवान पर उसका खूब श्रद्धा विश्वास था वह अपने पति के लिए बच्चों के लिए पूजा पाठ करती रहती थी अपने सौभाग्य के लिए वह साल में कई महीने उपवास करती थी ।
उसे विश्वास था अपनी भक्ति की शक्ति पर गीतू जब भी अपने मायके जाती वहां उसे कुछ खास सम्मान नहीं मिलता था क्योंकि वह गांव देहात में रहती थी पर उसके मायके में सब सरकारी नौकरी वाले थे सभी भाई-भाभियां सरकारी नौकरी वाले थे छोटी बहन भी सरकारी नौकरी वाले के घर शादी करके गई थी तो उसके ठाट-बाट के क्या कहने गीतू उसके सामने बहुत ही सिंपल सादगी से भरी बहुत सुंदर लड़की थी भले ही वह अमीर घर की बहुत थी पर उसने कभी भी इस बात का घमंड नहीं किया उसकी छोटी बहन उसे हमेशा निचा दिखाने में लगी रहती थी पर गीतू को कुछ विशेष फर्क नहीं पड़ता था मायके वाले दोनों बहनों में हमेशा भेदभाव करते थे छोटी के लिए ऊंची-ऊंची कपड़े गहने और गीतू को दूसरे घर के दिए हुए कपड़े दे दिया करते थे फिर भी गीतू इसका शिकायत नहीं करती थी क्योंकि
वह जानती थी कि मायके में उसकी स्थिति कहां तक थी गीतू का पति बहुत ही सुंदर राजकुमार जैसा था और उसकी छोटी बहन का पति उसके सामने नौकर की तरह लगता था ।वह तो सरकारी नौकरी के चलते छोटी की शादी करवा दिए थे इसी बात पर छोटी गीतू से बहुत ही ईर्ष्या करती थी शादी या कुछ भी समारोह हो छोटी सजने मे गीतू को टक्कर देती थी पर गीतू सादगी में रहना पसंद करती थी गीतू के बच्चे ही उसे तैयार कर दिया करते थे कि मासी के सामने कम ना लगे पर गीतू को इन सब चीजों से कुछ से फर्क नहीं पड़ता था वह तो अपने परिवार में व्यस्त हो गई थी उसे मायके की चका -चौंध से कोई मतलब नहीं था पर भगवान को कुछ और ही मंजूर था आर्थिक स्थिति के कारण गीतू को अपने मायके पर आश्रित होना पड़ा इसी बात पर उसके मायके वाले और खास करके उसकी छोटी बहन और भाई उसका निरादर करते थे क्योंकि मजबूर थी उसके पति की तबीयत बहुत खराब थी उसके स्वास्थ्य के चलते उसे अपनी जमीन भी बेचनी पड़ गई थी इसलिए वह मायके से थोड़ा मदद चाहती थी पर उसके भाइयों ने उसके साथ गद्दारी कर दी उसकी छोटी बहन को पूरा हिस्सा दे दिया पर ऋतु का हिस्सा सभी मिलकर खा गए उसके पति ने की गीतू के भाइयों के कारण कर्ज भी ले रखा था भाइयों की गद्दारी जानकर गीतू का पति सदमा में चला गया वह और बीमार रहने लगा उसे चिंता ने चारों तरफ से घेर लिया 2 साल की कड़ी इलाज के बाद भी उसका स्वास्थ्य नहीं सुधर पाया और उसका देहांत हो गया। उसका पूरा परिवार बच्चे सबभी दुख में डुब गये परिवार की जिम्मेदारी गीतू पे आ गई गीतू की भी जीने की इच्छा खत्म हो गई पर अपने बच्चों के लिए उसे जीना ही पड़ा । उसका विश्वास टूट गया जितनी पूजा पाठ भक्ति की थी उससे उसका मन हट गया।
गीतू को शुरू से विश्वास था कि उसका विश्वास कभी नहीं टूटेगा वह सौभाग्य के साथ ही रहेगी पर ऐसा नहीं हुआ सौभाग्य दुर्भाग्य में बदल गया वह विधवा हो गई उससे ईर्ष्या करने वाली बहन भाभियां अब कितना भी सोलह श्रृंगार करके गीतू के सामने आ जाए अब तो गीतू ने सादा लिबास अपना लिया था।
जो लड़की अपने घर की सौभाग्य लक्ष्मी थी उसका भाग्य दुर्भाग्य में बदलते ही उसका पूरा जीवन बदल गया ।
अब वह विधवा की जिंदगी जीने पर मजबुर हो गई उसके जीवन से सभी रंगों ने मानो नाता ही तोड़ लिया ।
इन सब के बावजूद वह अपने परिवार के लिए बड़े ही हिम्मत से सर उठा के जीती है क्योंकि कहीं ना कहीं अपनों के लिए उसके मन में अभी भी आस्था की जोत जलती रहती है।